पैसा बोलता है.....
ये पैसा बोलता हैं,
ये पैसा बोलता है,
रंग गोरा हो या काला हो,
जग उसका जो पैसे वाला हो,
घपले से मिले या रिश्वत से,
बनता है मुकद्दर दौलत से,
जो सच्चा है यहाँ कंगाल,
जो बेईमान है वो मालामाल,
ये पैसा बोलता हैं,
ये पैसा बोलता है...
ये गाना तो सबने सुना ही होगा,ये गाना १९८९ आई हिन्दी फिल्म काला बाजार फिल्म का है,इसे नितिन मुकेश ने गाया था,राजेश-रोशन ने कम्पोज किया था,म्यूजिक डाइरेक्टर भी राजेश-रोशन ही थे,इसे लिखा पयाम सईदी साहब ने था...
लेकिन पयाम सईदी साहब ने क्या खूब लिखा था इस गाने को,जब आप इस गाने को सुनेगे तो आपके सामने दुनिया की ऐसी सच्चाई निकलकर बाहर आती है जिसे सबके सामने आना ही चाहिए...
आजकल आपको हर एक काम के लिए पैसे चाहिए, कपड़े, भोजन , घर और यहांँ तक कि कई स्थानों पर आपको पानी के लिए भी पैसे चुकाने पड़ते हैं, हालांँकि ऐसा भी कहा जा सकता है कि "पैसा हर खुशी नही दे कर सकता है" लेकिन आप बिना पैसे के खुश भी नहीं रह सकते,चूंँकि पैसा हमारे जीवन का एक बड़ा हिस्सा बन चुका है, इसलिए आपको खुश रहने के लिए पैसें की जरूरत पड़ेगी ही पड़ेगी,
धन जीवन की मौलिक जरूरत है, जिसके बिना कोई भी अच्छे जीवन की कल्पना नहीं कर सकता,हमें अपनी छोटी से छोटी जरूरत को पूरा करने के लिए पैसें की आवश्यकता होती है, आधुनिक समय में, जब सभ्यता का विकास तेजी से हो रहा है और हर कोई पाश्चात्य संस्कृति का अनुसरण कर रहा है तो ऐसे समय में हमें वस्तुओं के बढ़ते हुए मूल्य के कारण पैसों की ज्यादा जरूरत होती है, पहले समय में, एक प्रथा प्रचलन में थी जिसे विनिमय प्रणाली कहा जाता था, जिसमें किसी को भी एक वस्तु के बदले में दूसरी वस्तु प्राप्त हो जाती थी, जब मैं बचपन में गाँव जाती थी अगर कुल्फी वाला आता था तो उसे एक कटोरी अनाज देकर चार-पाँच कुल्फियांँ आराम से मिल जातीं थीं,लेकिन अब इस आधुनिक संसार में प्रत्येक चीज को खरीदने के लिए केवल पैसों की जरूरत होती है,
मैं जब लोगों को पैसों के लिए हाय तौबा करते हुए देखती हूँ तो मन विदीर्ण हो जाता है,आप पैसें इकट्ठे करते हैं अपने सुख के लिए और उसी पैसें को कमाने के लिए अपना सुख खो देते हैं,माना की पैसा भी जरूरी है लेकिन पैसा आपसे ज्यादा जरूरी नहीं हो सकता,पैसों का लालच भी सबको होता है लेकिन इतना कि आप अपना सुकून खो दो,अपना चैन खो दो,पैसा भी आप अपने सुकून और शांति के लिए हासिल करते हो,लेकिन फिर आपको उस पैसें की ऐसी लत लग जाती है कि उस पैसें के लिए आप अपना सुकून और शांति भंग कर लेते हो.....
इन्सान तो केवल मुंँह से बोलता है,लेकिन ये सच है कि पैसा चारों तरफ़ से बोलता है,पैसें वाला चाहे कार की ड्राइविंग सीट पर बैठे या पिछली सीट पर आखिर लोग पहचान ही लेते हैं और अगर कोई गरीब-अनपढ़ शख़्स सूट-बूट और टाई पहनकर कार की पिछली सीट पर बैठे, तो भी उसके पड़ोसी उसे बोल ही देंगे, कि “कौआ चला हंस की चाल…भाई पैसें वाला है चाहें अनपढ़ ही क्यों ही ना हो आजकल तो पैसा ही बोलता है.....तभी तो एक गँवार के इतने ठाट हैं....
इस दुनिया में अगर आप ध्यान से सुनेंगे, तो पैसे की आवाज़ साफ़-साफ़ सुनाई देगी, पैसा बोलता ही नहीं, दहाड़ता भी है, उसके सामने आदमी घिघियाता है, रोता है, फरियाद करता है और भक्त बनकर पैसे की पूजा करता है, पैसा वो रहस्यमयी चाबी है है जो हर बंद ताले को खोल देती है, पैसा ना हो तो खून के रिश्तों में भी चीनी कम हो जाती है और पैसा हो तो बेगानी शादी में भी अब्दुल्ला दीवाना हो कर नाचता है, पैसे वाले मूर्ख की बकवास भी प्रवचन का आनंद देती है और गरीब प्रकाण्ड विद्वान की नेक सलाह भी सभी को बकवास लगती है, पैसे वाले का चरण रज चन्दन होता है और गरीब इन्सान के सलाम का जवाब देने से भी लोग कतराते हैं.......मन में ये सोचने लगते हैं कि क्या पता उधार मांगने के लिए नमस्ते कर रहा हो..!
पैसा एक निर्जीव वस्तु है लेकिन सच्चाई ये है कि इसमें लोगों के प्राण बसते हैं,कहीं पौंड, कहीं डाँलर, कहीं रूबल, कहीं येन तो कहीं फ्रांक कहलाता है ये,इसकी शक्ति का कोई पार नहीं है, जिसके पास ये है उसके पास सब कुछ है, जिस देश का खजाना बड़ा है, उसी की दुनिया में चलती है, आज जिसे देखो वह अमेरिका जा रहा है, क्योंकि वहाँ डाँलर की जबरदस्त माया है, दुबई, सिंगापुर, हाँगकाँग आदि की दौलत ने आज लोगों को दीवाना बना रखा है,सम्बन्ध और रिश्तों के बनने-बिगड़ने में पैसें का बहुत बड़ा हाथ रहता है,जैसे शक्कर को देखकर चीटियाँ एकट्ठी होती हैं, वैसे ही पैसें देखकर लोग रिश्ते जोड़ने लगते हैं,अकसर कवि पूनम के चाँद को बड़ा आकर्षक बताते हैं, लेकिन पैसें के आकर्षण ने उसे भी मात कर दिया ,पैसों को पाने के लिए बड़े बड़े युद्ध होते आएं हैं, पैसें का अत्यधिक आकर्षण इन्सान को हैवान बना सकता है,अवगुणों को ढाँकने में भी पैसें का कोई जवाब ही नहीं है, पैसों के कारण काले को भी गोरे जैसा प्यार मिलता है,जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सोना बन जाता है, वैसे ही पैसों के स्पर्श से अवगुण भी गुण में बदल जाते हैं,
पैसें की कोई भाषा नहीं होती,पैसा बगैर ज़बान के ही बोलता है, बोलता ही नहीं चिढ़ाता भी है, पैसा जिसके पास जाता है, उसे मुखिया बना देता है,जो वो बोले वही सत्य वचन, जिधर से जाए वही रास्ता, पैसा हर किसी की परिभाषा बदल सकता है, हर कान पैसे की आवाज़ सुनता है, समाज भी पैसे वाले तराजू की जय जयकार करता है,पैसा ही रस्म और परम्परा तय करता है,गरीब आदमी की पत्नी अगर कम कपड़े पहने तो मज़दूर और अगर पैसे वाले की बीवी कम कपड़े पहन कर निकले तो फैशन कहलाता है, ये बिल्कुल सही बात है कि ये पैसा बोलता है......ये पैसा बोलता है.....
समाप्त.....
सरोज वर्मा.....
शताक्षी शर्मा
07-Nov-2022 05:17 AM
Bahut khub
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Teena yadav
06-Nov-2022 03:29 PM
OSm
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Haaya meer
06-Nov-2022 03:16 PM
Amazing
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